Ras and Chhand (रस और छंद)
Overview
रस और छंद हिंदी साहित्य की आत्मा हैं। रस को काव्य की आत्मा कहा जाता है — यह वह आनंद है जो पाठक या श्रोता को साहित्य पढ़ते या सुनते समय प्राप्त होता है। छंद काव्य की शरीर-रचना है — यह वर्णों और मात्राओं की व्यवस्थित गणना से बनी लयबद्ध संरचना है।
MPESB Group 1/2/3 परीक्षाओं में सामान्य हिंदी खंड में रस और छंद से सीधे प्रश्न आते हैं। प्रश्न मुख्यतः रस की पहचान, उसके अवयवों का मिलान, छंद की परिभाषा, मात्रा गणना और प्रमुख छंदों की विशेषताओं पर आधारित होते हैं।
विद्यार्थियों को नौ रसों के नाम, स्थायी भाव, और प्रमुख छंदों की मात्रा/वर्ण संख्या कंठस्थ करनी चाहिए। साथ ही उदाहरण-आधारित पहचान का अभ्यास आवश्यक है।
Key Concepts
रस (Ras) — काव्य की आत्मा
- रस की परिभाषा: "विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्तिः" — भरतमुनि के अनुसार विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी भाव के संयोग से रस की निष्पत्ति होती है।
- रस के चार अवयव (अंग):
- स्थायी भाव: मन में स्थायी रूप से विद्यमान भाव (जैसे रति, क्रोध, शोक)
- विभाव: स्थायी भाव को जगाने वाले कारण — आलंबन (मुख्य आधार) और उद्दीपन (सहायक)
- अनुभाव: स्थायी भाव की बाह्य अभिव्यक्ति (रोना, हँसना, काँपना)
- संचारी/व्यभिचारी भाव: अस्थायी भाव जो आते-जाते रहते हैं (33 भाव — निर्वेद, ग्लानि, शंका आदि)
- नौ रस (नवरस): भरतमुनि ने आठ रस बताए; बाद में शांत रस को जोड़कर नौ हुए।
छंद (Chhand) — काव्य का शरीर
- छंद की परिभाषा: वर्णों या मात्राओं की निश्चित संख्या और क्रम से बनी लयबद्ध रचना।
- छंद के प्रकार:
- मात्रिक छंद: मात्राओं की गणना पर आधारित (दोहा, चौपाई, सोरठा)
- वर्णिक छंद: वर्णों की गणना पर आधारित (सवैया, कवित्त)
- मात्रा गणना के नियम:
- ह्रस्व स्वर (अ, इ, उ, ऋ) = 1 मात्रा
- दीर्घ स्वर (आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ) = 2 मात्राएँ
- संयुक्त व्यंजन से पहले का ह्रस्व स्वर = 2 मात्राएँ (गुरु हो जाता है)
Formulas / Key Facts
नवरस और उनके स्थायी भाव (अत्यंत महत्वपूर्ण)
| क्रम | रस | स्थायी भाव | उदाहरण संदर्भ |
|---|---|---|---|
| 1 | श्रृंगार | रति (प्रेम) | नायक-नायिका का प्रेम |
| 2 | हास्य | हास | हँसी उत्पन्न करने वाली स्थिति |
| 3 | करुण | शोक | वियोग, मृत्यु का वर्णन |
| 4 | रौद्र | क्रोध | युद्ध में वीर का आक्रोश |
| 5 | वीर | उत्साह | शौर्य, साहस का वर्णन |
| 6 | भयानक | भय | डरावना दृश्य |
| 7 | बीभत्स | जुगुप्सा (घृणा) | घृणित वस्तु का वर्णन |
| 8 | अद्भुत | विस्मय (आश्चर्य) | चमत्कारी घटना |
| 9 | शांत | निर्वेद (वैराग्य) | वैराग्य, मोक्ष चिंतन |
याद करने का सूत्र: "श्री हा क रौ वी भय बी अ शां" (श्रृंगार, हास्य, करुण, रौद्र, वीर, भयानक, बीभत्स, अद्भुत, शांत)
श्रृंगार रस के दो भेद
- संयोग श्रृंगार: नायक-नायिका का मिलन
- वियोग श्रृंगार: विरह की अवस्था
प्रमुख छंदों की मात्रा संख्या
| छंद | प्रकार | मात्रा/विशेषता | यति (विराम) |
|---|---|---|---|
| दोहा | मात्रिक | विषम चरण = 13, सम चरण = 11 (कुल 24) | 13-11 पर |
| सोरठा | मात्रिक | दोहे का उल्टा: 11-13 मात्राएँ | 11-13 पर |
| चौपाई | मात्रिक | प्रत्येक चरण = 16 मात्राएँ | चरण के अंत में |
| रोला | मात्रिक | प्रत्येक चरण = 24 मात्राएँ (11+13) | 11-13 पर |
| कुंडलिया | मात्रिक | दोहा + रोला (6 पंक्तियाँ) | — |
महत्वपूर्ण: दोहा में अंतिम वर्ण सदा लघु (1 मात्रा) होता है।
Worked Examples
उदाहरण 1: रस पहचान
पंक्ति: "मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई।"
चरण-दर-चरण हल:
- विषय-वस्तु देखें: कृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम व्यक्त हो रहा है
- स्थायी भाव पहचानें: रति (प्रेम भाव)
- उत्तर: श्रृंगार रस (भक्ति श्रृंगार)
उदाहरण 2: रस पहचान
पंक्ति: "सिंहासन हिल उठे, राजवंशों ने भृकुटी तानी थी, बूढ़े भारत में भी आई, फिर से नई जवानी थी।"
हल:
- विषय: स्वतंत्रता संग्राम का वर्णन, शौर्य, जोश
- स्थायी भाव: उत्साह
- उत्तर: वीर रस
उदाहरण 3: छंद पहचान — मात्रा गणना
पंक्ति: "रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय।"
मात्रा गणना:
- र(1)+हि(1)+म(1)+न(1) = 4
- धा(2)+गा(2) = 4
- प्रे(2)+म(1) = 3
- का(2) = 2
- प्रथम चरण कुल = 13 मात्राएँ
- म(1)+त(1) = 2
- तो(2)+ड़ो(2) = 4
- च(1)+ट(1)+का(2)+य(1) = 5
- द्वितीय चरण कुल = 11 मात्राएँ
उत्तर: दोहा छंद (13-11 मात्राएँ)
Common Mistakes
| गलत सोच | सही समझ |
|---|---|
| "वीर रस और रौद्र रस एक ही हैं क्योंकि दोनों में युद्ध है" | वीर रस का स्थायी भाव उत्साह है; रौद्र रस का क्रोध। उत्साह में जोश है, क्रोध में आक्रामकता। |
| "दोहा और सोरठा समान हैं" | दोहा में पहला चरण 13, दूसरा 11 मात्रा। सोरठा में उल्टा: पहला 11, दूसरा 13। |
| "संयुक्त अक्षर को अलग गिनना" | संयुक्त व्यंजन (जैसे 'प्र', 'क्ष') एक ही वर्ण है, पर उससे पहले का ह्रस्व स्वर गुरु (2 मात्रा) हो जाता है। |
| "शांत रस भरतमुनि के मूल आठ रसों में है" | भरतमुनि ने 8 रस बताए; शांत रस बाद में आचार्यों द्वारा जोड़ा गया। |
| "करुण और बीभत्स में अंतर न करना" | करुण में शोक (दुख) है; बीभत्स में जुगुप्सा (घृणा) है। |
Quick Reference
- रस = स्थायी भाव + विभाव + अनुभाव + संचारी भाव
- नवरस सूत्र: श्रृंगार-रति, हास्य-हास, करुण-शोक, रौद्र-क्रोध, वीर-उत्साह, भयानक-भय, बीभत्स-जुगुप्सा, अद्भुत-विस्मय, शांत-निर्वेद
- दोहा: 13-11 मात्राएँ (विषम-सम), अंत में लघु
- सोरठा: दोहे का उल्टा → 11-13 मात्राएँ
- चौपाई: 16-16-16-16 (चार चरण, प्रत्येक 16 मात्राएँ)
- मात्रा नियम: ह्रस्व (अ, इ, उ) = 1; दीर्घ (आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ) = 2